ठण्ड की ठिठुरती रात

ठण्ड के दिन ज़्यादा अच्छे होते थे।

बहुत प्यार आये तो छत पर चौकी डाल दादी चम्पी कर देती थी।
फरवरी में कभी बारिश हो जाये तो कम्बल फिर से निकल आया करते थे।
दोस्तों की चक्कलस में बाजार रंगीन हो जाया करते थे।

तब जेब में कुछ सिक्के हों तो सल्तनत के मालिक से लगते थे।
चाट-पकोड़े मिलते थे खूब , रंगीन बैलून से मन मुग्ध सा हो जाया करते थे ।
खेलने जाओ तो ठिगुणे छीलकर आना 3 दिन तक दर्द देता था।
सहज था फिर भी जीवन।
हर दिन कुछ नया सा करने को  मन करता था।

आज भी ठण्ड ही सबसे सबसे सुन्दर है।
पर हवा खाते  कुर्सी लगाने की जगह मांगो तो 1Bhk के 12 हज़ार महीने लगता है ।
बारिश हो भी जाये तो भी नल में पानी ठीक से नहीं आता।
अकाउंट इनफार्मेशन का SMS तो आता है , पर सिक्कों की वो खनखनाहट की प्रस्सनता नहीं है।

शायद ये शहरों की बात है , जहा सच में तो आपका रूह भी अपना नही होता।
सबको भागना होता है, move-on और live-on करना होता हैं।
ज़ाहिर है , इसमें कुछ अभद्र नहीं है।
बस सिर्फ कुछ खोखला सा है, जिस्म के भीतर झाँक नहीं पाता ।

हाँ मैं बड़ा हो गया हूँ , वो बचपन की याद रह गयी हैं।
पर सिर्फ वही तो नही बदला।

क्रूरता भी तो बढ़ गयी है।
बारिश में कोई किसी को अपनी छतरी नहीं देता।
ज़्यादा पा ले तो दीवार ऊँची कर लेता है, ताले बड़े कर लेता है।

‘अपनों’ का डेफिनिशन इन शैतानों ने आकर बदल दिया है।
सब खून के प्यासे बन गए हैं, बम-बंदूकों के धंधे में चार चाँद लग गए हैं।

मेरे अंदर का बचपन इसे पचा नहीं पाता , वो चक्कलस को मिस करता है।
दादी को मिस करता है।

पर वो सुनी सी कहानियां ही इन शैतानों को मार भगाएंगे, ये सोचकर मन को शांत करता हूँ।
जब वक़्त मिल जाये , रात दिन कुर्सी लगाकर ठण्ड कर इंतज़ार करता हूँ।

 

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3 thoughts on “ठण्ड की ठिठुरती रात

  1. बहुत बढ़िया साथी….
    लेकिन आज के इस जीवन में इतना नास्टेल्जिक होकर करोगे क्या? यही कहते हैं सब और शायद हम भी इतने ज़्यादा ‘सावधान’हो गए हैं कि ‘मस्ती’अब होश की दवा सी नहीं लगती. जोश मलीहाबादी के हवाले से एक शे$र मौन्जुन है- मैं मरीज़े होश था, मस्ती ने अच्छा कर दिया….
    अभी कोई ज़्यादा सतर्क व्यक्ति इस कविता पर यह कह सकता है कि ‘दादी से चम्पी कराने में तो ‘जेंडर’ का मसला है, तो ज़रा सावधान अब दौर आ गया है जब हम इंसानियत और इंसान की करेक्टनेस का खाका भी खींच चुके हैं.. आखिर तो इंसान गढ़े ही जाते हैं……….. लिखते रहो सबकी परवाह से बेखबर और बहुत होश में रहे बगैर,…,.

    1. बहुत शुक्रिया साथी।
      बचपन बल देता है, इस रोज़ की जद्दो-जहद में कम ही सही
      सोच-सोच कर सीखने के लिए थोड़े से पल देता है। 🙂

  2. क्या बात है…
    हर बात पी कहते हो कि तू क्या है
    टू ही बता ये अंदाज़े गुफ्तगू क्या है
    रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
    जो आँख ही से न टपका तो ये लहू क्या है?

    और एक निदा फाजली का, जो मुझे बहुत पसंद है..
    उस बच्चे की कापी अक्सर पड़ता हूँ
    सूरज के माथे पर जिसने शाम लिखा …

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